भारत में डिजिटल निगरानी और मानवाधिकार: सच क्या है?

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भारत में डिजिटल तकनीक के बढ़ते इस्तेमाल के साथ सरकारी निगरानी को लेकर बहस तेज हो गई है। कई मानवाधिकार संगठनों का दावा है कि बिना स्पष्ट कानून और पारदर्शिता के की जा रही डिजिटल निगरानी नागरिक स्वतंत्रता के लिए खतरा बन सकती है।

हाल ही में सामने आए कुछ मामलों में आरोप लगा कि सरकारी एजेंसियाँ नागरिकों की ऑनलाइन गतिविधियों पर नजर रख रही हैं। हालांकि सरकार का कहना है कि यह निगरानी राष्ट्रीय सुरक्षा और साइबर अपराध रोकने के लिए आवश्यक है।

विशेषज्ञों का मानना है कि सुरक्षा और निजता के बीच संतुलन बेहद जरूरी है। सुप्रीम कोर्ट भी निजता को मौलिक अधिकार मान चुका है। ऐसे में किसी भी प्रकार की निगरानी के लिए स्पष्ट कानूनी ढांचा, जवाबदेही और न्यायिक निगरानी अनिवार्य होनी चाहिए।

फैक्ट चेक में सामने आया है कि अभी भारत में कोई व्यापक डेटा प्रोटेक्शन कानून लागू नहीं है, जिससे नागरिकों की डिजिटल सुरक्षा पर सवाल उठते हैं। नया डेटा संरक्षण कानून संसद में विचाराधीन है, लेकिन इसके प्रभावी होने में समय लगेगा।

जब तक मजबूत कानून नहीं बनते, तब तक डिजिटल अधिकारों की रक्षा एक बड़ी चुनौती बनी रहेगी।

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